শুক্রবার ২৯ আগস্ট ২০১৪, ১৪ ভাদ্র, ১৪২১ সাইনইন | রেজিস্টার |bangla font problem
mehedimanzur

আমার সাম্প্রতিক মন্তব্যComment

মেহেদী হাসান মঞ্জুর

\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nসাহিত্য চর্চা করার আগ্রহ ছোট বেলা থেকে থাকলেও, বিশ্ববিদ্যালয়ে ভর্তি হওয়ার আগ পর্যন্ত পাঠ্যপুস্তক বাদে গল্প-কবিতার বই পড়ার সুযোগ আমার কোন দিন তেমন ভাবে হয়ে উঠেনি। আর আগ্রহটাও হয়তো তেমন জোড়ালো ছিল না, থাকলে হয়তো সুযোগ তৈরী করে নেয়া যেত। বিশ্ববিদ্যালয়ে ভর্তি হয়ে আবাসিক হলে উঠে যাবার পর বই পড়ার সুযোগ আসে আর ধীরে ধীরে আগ্রহটাও যেন পাল্লা দিয়ে বাড়তে থাকে। বই পড়া শুরু হয় মূলত উপন্যাস দিয়ে, তারপর ছোটগল্প, নাটক, প্রবন্ধ, এবং সবশেষে কবিতায় ছড়িয়ে যাই। অন্য কোন কারন নেই-পড়ি শুধু ভাল লাগে বলে, পড়ে আনন্দ পাওয়া যায় তাই-পড়তে পড়তে অদ্ভুত এক ভালো লাগায় মনপ্রাণ ছেয়ে যায়। আর পড়িও- গ্রামের বাড়ীতে গেলে রুমে দরজায় খিল এঁটে, বিশ্ববিদ্যালয়ের হলে থাকাকালীন-বিছানায় দেয়ালের সাথে ঠেস দেয়া বালিশে হেলান দিয়ে, হলের পাঠকক্ষে, পাবলিক লাইব্রেরীতে, বিদ্যুৎ চলে গেলে মোবাইল ফোনে আলো জ্বালিয়ে পর্যন্ত; ক্ষিপ্র উন্মাদের মত পাতার পর পাতা উল্টিয়ে চলি, অন্য কোন দিকে কোনধরনের খেয়াল থাকেনা, খাওয়া-নাওয়া সব ভুলে যাই, গরমে ঘেমে নেয়ে উঠি, শীতে ঠক ঠক করে কাঁপি- আমার পড়ার বেগ থামতে চায় না। নিত্য সঙ্গী হিসেবে থাকে শুধু সিগারেট। বইয়ের একটি দুটি প্যারা বা কয়েকটি লাইন যদি বেশী ভালো লেগে গেলে; সাথে সাথেই শরীরে নিকোটিনের চাহিদা বেড়ে উঠে- রাশি রাশি ধোয়া উড়িয়ে ভালো লাগাটিকে উদযাপন না করলে চলে না। মাঝে এমন হত, অনেক বেশী ভালো লেগে গেলে; হৃদয়ে-মনে উত্তেজনার এমন চরম শিখরে উঠে পড়তাম যে, বইটি সাথে সাথে বন্ধ করে পাশে রেখে দিতে হত, অস্থির হয়ে যেতাম, হাঁপাতে থাকতাম, এবং মনের কোন একটি বিশেষ জায়গা যেন বিশেষ ভাবে শান্ত হয়ে পড়ত। দৈহিক সঙ্গমে পরম আনন্দ লাভের সময় নর-নারী যেমন শারীরিক-মানসিক অবস্থায় উপনীত হয়, আমার অবস্থাটাও হত তেমনি বা তার চেয়ে বেশী উত্তেজনাকর। আমি যেন বইয়ের সাথে মানসিক সঙ্গমে পরম পুলকটি লাভ করছি।\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nএকবার ট্রেনে চেপে ঢাকা থেকে সিলেট যাচ্ছি বেড়াতে, আমরা তিন বন্ধু; কয়েকটি দর্শনীয় স্থান দেখে আসব, নগরের বদ্ধ পরিবেশে থাকতে থাকতে মনটি যেন পচে যাচ্ছে সেখানে বাইরের একটু হাওয়া না লাগালেই আর নয়। ট্রেনের জানালা দিয়ে বাইরের রাত্রের প্রকৃতি দেখতে দেখতে ছুটে চলেছি, প্রকৃতির কোমল গন্ধে বুক ভরে যাচ্ছে। যাত্রাপথে আমাদের ট্রেনটি ভোরের দিকে কুলাউড়া ষ্টেশনে বেশ কিছুটা সময়ের জন্য স্টপেজ দেয়। আমি, জীবনানন্দ দাশের “কবিতা সমগ্র” বইটি হাতে নিয়ে ষ্টেশনের কম্পাউন্ডে নেমে পড়ি; আলোকিত নিরিবিলি একটু জায়গা পেয়ে বসে পড়ে কবিতার লাইনে চোখ বোলাতে বোলাতে, ধীরে ধীরে ভাবের গভীরতায় তন্ময় হয়ে যেতে থাকি । কখন যে উঠে পড়ে পায়চারী করতে শুরু করেছি-চোখ বোলানো প্রথমে বিড়বিড়ানিতে, তারপর ধীরে ধীরে বাড়তে বাড়তে উচ্চস্বরে পরিনত হয়েছে-ঠিকমতো বুঝে উঠতে পারিনি। আমি যেন ভুলেই গিয়েছি ঢাকা থেকে সিলেট যাওয়ার পথে একটি রেলস্টেশনে আছি, আর আমার চারপাশে আছে বিভিন্ন রকমের অনেক লোকজন। তখন মনে হচ্ছিল আমি যেন অন্ধকার রাত্রে, সমুদ্রের নির্জন বেলাভুমিতে দাঁড়িয়ে জীবনান্দের “আট বছর আগে একদিন” কবিতাটি একনাগাড়ে পড়ে চলেছি। আমার এক বন্ধু হঠাৎ করে আমার নাম ধরে ডেকে উঠলে আমি সম্বিত ফিরে পাই। বই থেকে চোখ তুলে এদিক ওদিক তাকাতেই দেখি, অনেকেই আমার দিকে হা-করে তাকিয়ে আছে; কয়েকজন মিলে জট পাকিয়ে অনুচ্চস্বরে আমাকে নিয়ে কথাবার্তা চলছে। ওরা যেন আমাকে পাগল ঠাওরেছে, আসলেই আমি তখন আবেগে, উত্তেজনায়, তীব্র বোধে পাগল হয়ে গিয়েছিলাম। \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nবিশ্ববিদ্যালয়ে থাকাকালীন সময়ে বাড়ি থেকে যে কয়টি টাকা আমাকে মাসোহারা বাবদ পাঠানো হত তার অর্ধেক টাকা সাথে সাথেই বই কেনা বাবদ খরচ হয়ে যেত। বই কেনার বিষয়টা এমন একটা স্থায়ী অভ্যাসে দাঁড়িয়ে গিয়েছিল যে, টাকা হাতে পাওয়ার সাথে সাথেই আমাকে বইয়ের দোকানে দৌড়াতে হত। মাঝে মাঝে এমনও হয়েছে বইয়ের লোভ সামলাতে না পেরে যে পুরো টাকাটাই বই কেনা বাবদ শেষ হয়ে গিয়েছে বা কয়েকটি টাকা মাত্র ফেরত আনতে পেরেছি। তারপর সারাটি মাস আমাকে ধার-কর্জ করে, দোকানে বাকী খেয়ে কাটাতে হয়েছে। যে মাসে বই কেনা বাবদ পুরো টাকাটা শেষ হয়ে যায়নি তখনও কিছু টাকা হাতে আছে ঐ সময় পকেটে টাকা নিয়ে বইয়ের দোকানের সামনে দিয়ে যেতে ভয় পেতাম বা কোন দরকারে বইয়ের দোকানের সামনে দিয়ে যেতে হলে দ্রুত হেটে চলে আসতাম কারন কিছুক্ষন বইয়ের দোকানের সামনে পায়চারি করলে আমি নিশ্চিত জানি, পকেটের অবশিষ্ট টাকা হাওয়াই মিঠাইয়ের মত মিলিয়ে যাবে। পুরো মাস টাকা বিহীন চলার যে যন্ত্রনা আমাকে পোহাতে হয় বার বার সেই যন্ত্রনা হয়তো আমাকে আবারও সহ্য করতে হবে তার জন্যই বইয়ের দোকানের সামনে দিয়ে যেতে আমার এতো ভয়।\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nরুমে পর্যাপ্ত বই আছে কিন্তু হাতে কোন টাকা আর অবশিষ্ট নেইঃ এমন অবস্থায় যে যন্ত্রনাটা সবচেয়ে মর্মান্তিক হয়ে দেখা দেয় সেটি হল- ঘন্টা খানেক পরপরই আমার শরীরে নিকোটিনের চাহিদা চরমে পৌঁছে যায়, ঐ মূহুর্তে ধূমপান না করলে আমি বইয়ের পাতায় মনঃযোগ দিতে পারিনা আর দোকানদার সবকিছুই বাকীতে বিক্রি করে কিন্তু সিগারেট বাকীতে দিতে চায় না। পড়ার আগ্রহ অনেক বেশী থাকা সত্ত্বেও আমি শুধু ঐ নিকোটিনের চাহিদা পূরণ না করার কারনে বইয়ের পৃষ্ঠায় পৃষ্ঠায় ভরা আনন্দ রস মনের সাধ মিটিয়ে পান করতে ব্যার্থ হতে থাকি অবিরত। বই পড়া এবং সিগারেট খাওয়া এমন একটা অবিচ্ছেদ্য অশালীন সম্পর্কে জড়িয়ে পড়ে যে দুটোকে প্রেমিক-প্রেমিকার মত পাশা-পাশি শুইয়ে না রাখলে আমার চলে না। কিন্তু এ দুটোকে পাশাপাশি রাখতে আমি প্রায় সময়ই ব্যর্থ হতাম। একজনের অনুপুস্থিতি আরেকজন সহ্য করতো না বলে একজনকে একা ভোগ করা মূলত বই পড়াটাকে একা ভোগ করা আমার পক্ষে একরকম অসম্ভবের পর্যায়ে দাঁড়িয়ে গিয়েছিল। এই দুইজনকে একসাথে রাখতে আমাকে আনেক কাঠখড় পোড়াতে হয়েছে। একটি দোকানদারকে অনেক কষ্টে রাজী করালাম যেখানে দোকানদার সবচেয়ে কমদামী সিগারেটটি আমার কাছে বাকীতে বিক্রি করতে সম্মত হয়ঃ শর্ত হচ্ছে সকালে এবং বিকালের নাস্তা তার ওখান থেকে সারতে হবে কিন্তু ওই লোক নাস্তা এমন জঘন্য তৈরি করে যে কাঠের মধ্যে হাতুড়ি পিটিয়ে যেমন পেরেক ঢোকাতে হয়, নাস্তাগুলোও তেমনি জিহ্বার পেরেকে ঠুকে ঠুকে অনেক কষ্টে পেটের মধ্যে চালান করতে হত। পাশের দোকানের রসালো জিলিপি, মচমচে-এইমাত্র তেলে ভাজা সিঙ্গাড়া, মখমলের মত নরম আলুর চপ, ফোস্কার মত ফুলে ফুলে উঠা বেগুনি, নরমভাবে পরস্পরকে জড়িয়ে ধরা ছোলা ভাঁজা আমার দিকে এমনভাবে হা করা তাকিয়ে থাকতো যে, মনে হত আমি না খেলে ওরাই আমাকে হয়তো সত্যি খেয়ে ফেলবে! ইট দিয়ে বাঁধানো নিরস সিমেন্টের বেঞ্চে বসে আমাকে বিরাট এক কড়াই ভর্তি ডিম ছাড়া বানানো সস্তা নুডলসের কড়কড়ে ভাজার খানিকটা ছোট্ট একটা প্লাস্টিকের প্লেটে মরচে পড়া স্টিলের চামচ দিয়ে মুখে তুলে চিবোতে হত। \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nআমাদের বাড়ির পাশে একটা নদী আছে-ছোট নদী যাকে বলা হয়- গ্রামের লোকজন আদর করে ডাকে গাঙ্গ, ঐ নদীটি ছিল আমার মানসিক শক্তির বিরাট একটা উৎস। গ্রামের বাড়িতে গেলে- ভরা থাকলে তো কথাই নেই শুকনা মৌসুমেও -সকালে, বিকেলে এমনকি রাত্রেও আমি ঘন্টার পর ঘন্টা নদীর ধারে বসে থাকতাম- কখনো একা কখনো আবার চার-পাঁচজন মিলে আড্ডা দিয়ে কাটাতাম। আবার মাঝে মাঝে বিকেল বেলায় দুই-তিনজন মিলে নদীর ধার দিয়ে মৃদুমন্দ হেঁটে বেড়াতাম। রাশি রাশি আশা-ভরসা-ভালোবাসা-আস্থা-মুগ্ধতা-স্নিগ্ধতা নদীর বাতাসের সাথে মিলেমিশে আমার হৃদয়ে মনে ছড়িয়ে ছিটিয়ে পড়ত। বাড়ির পাশের চরাক্ষেতের সবুজ ধান গাছ, গম গাছ, মাটিতে বিছানো ছোট ছোট কচি পাতার কলাই গাছ, হলুদ সরিষা ফুল আর বর্ষাকালে শাপলা ফুল-শালুক পাতার সমারোহ থেকেও কিছুটা মানসিক শক্তি আমি সংগ্রহ করতাম। নাগরিক জীবন আমার মানসিক শক্তিকে ধীরে ধীরে শুষে নিত-আমি শুন্য হয়ে যেতাম, সকল ধরনের উদ্যম হয়ে যেত নিঃশেষিত, মনে-প্রাণে-শরীরে চরমভাবে ক্লান্ত হয়ে পড়তাম। গ্রামের নদী, চরাক্ষেত, সবুজ গাছপালা থেকে নিয়ে আসা মানসিক শক্তি মাসখানেক টিকতো কখনো বা পনের দিনেই যেতো ফুরিয়ে। আর কোনদিকে না তাকিয়ে তখনই গ্রামমুখো হতে হত। শুধু মানসিক শক্তি নয় শারীরিক শক্তি ফিরে পাওয়ার জন্যও আমাকে গ্রামে ফিরতে হত। হলের ক্যান্টিনে পচা মাছের ঝোল খেতে খেতে আবার মাঝে মাঝে টাকার অভাবে না খেয়ে থাকতে থাকতে মনের মত শরীরটাও মরে যেতে থাকতো। শুধু মন নয় শরীরটাকে বাঁচানোর জন্যেও নদীর টাটকা মাছ, চরার ধানের ঢেঁকি ছাটা চাল, গমের লাল আটার রুটি, চালের সাথে মিশিয়ে ঢেঁকিতে গুড়ো করা থকথকে মসুরের ডাল, গমখেতে আগাছার মত গজানো বাইত্যা শাক, বাড়ীর পাশের ডোবার হেলেঞ্চা শাক-কলমী শাক, উঠোনে পুইয়ের মাচা-লাউয়ের মাচা, ঘরের কোনে পেয়ারা গাছ, বাহির বাড়ীতে সার বেধে দাঁড়ানো আমগাছ, টিউবওয়েল এর পাশে জাম গাছ, আমড়া গাছ, বাড়ির কাছাড়ে টমেটোর চারা, বর্ষা কালে চরার পানির নিচে শালুক, উঠানে খেলে বেড়ানো ঝুটি উঠা মোরগ-এদের কাছে আমাকে ফিরে আসতে হত- বার বার, পনের দিন-একমাস অন্তর অন্তর। গ্রামের এ সমস্ত পরিবেশ আমার শারীরিক-মানসিক স্বাচ্ছন্দ দিত বাড়িয়ে- পড়াটাকে আরো নিজের করে পেতাম। মাঝে মাঝে গ্রামে থাকাকালীন এরকম মনে হত শহরে সম্ভবত আমি মরে ছিলাম, গ্রামে এসে আবার বেঁচে উঠেছি। গ্রামে আসার সময় বাসস্ট্যান্ডে নেমে সেখান থেকে ভ্যানে চড়ে বাড়িতে আসতে হত কাচা রাস্তা ধরে-এখন যদিও রাস্তাটি পাকা হয়ে গিয়েছে। রাস্তাটি ছিল এবড়ো-থ্যাবড়ো আর খানা-খন্দকে ভর্তি ফলে ভ্যান গাড়ীটি অনেক কষ্টে হাঁপিয়ে হাঁপিয়ে চলত। অনেক সময় ভ্যানের চাকা আটকে যেত কোন গর্তের মধ্যে। গ্রামের পরিবেশে সাহিত্যচর্চা আমাকে এত বেশী আকর্ষন করত যে মনে হত ভ্যান থেকে নেমে একদৌড়ে বাড়ি চলে এসে বইয়ের পাতা খুলে নিমগ্ন হয়ে যাই আনন্দময় জগতে। অনেক কষ্টে নিজের শরীরটাকে ভ্যানের উপরে ধরে রাখতাম শুধু আর মনটা ঝিঁঝিঁ ডাকা নির্জন রাত্রে কুপি জ্বালানো ঘরের কোনে চৌকির উপরে বইয়ের পাতা খুলে বসে থাকতো। \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nবিশ্ববিদ্যালয় ছেড়ে দিয়েছে বেশ কিছু দিন হল- আমার নামের পাশে চিরঅভ্যস্ত “ছাত্র” শব্দটি আর নেই। শহরের এক কোনে থাকি, এখানেও পড়েই চলেছি। পড়াটাকে এখন আর কোন ধরনের কাজ বলে মনে হয় না, শ্বাস-প্রশ্বাসের মত মত নিত্যদিনের অভ্যাসে দড়িয়ে গেছে যেন। আবার মাঝে মাঝে এমন সময়ও আসে যখন পড়তে আর ভালো লাগেনা তখন হতাশারা আমাকে এমনভাবে চারপাশ দিকে ঘিরে ধরে যে, আমি যেন বিশাল সমুদ্রের নোনা পানিতে ধীরে ধীরে আবশ্যিকভাবে তলিয়ে যাচ্ছি। আমার সারা জীবনে একমাত্র বিশ্বস্ত সঙ্গী (সাদা কাগজে কালো কালো অক্ষরে ভরা) বই- আমার আশেপাশে বইয়ের অভাব কখনো আমি হতে দেইনি, খেয়ে-না খেয়ে আমার চারপাশের শূন্যতা বই দিয়ে ভরে রেখেছি- এই সঙ্গীটিকে যখন মন থেকে হারিয়ে ফেলি তখন মনে হয় এই বিরাট পৃথিবীতে আমি স্বজনহীন দাঁড়িয়ে- শূন্য, একা। জনতার মাঝে নির্জনতার মত অব্যক্ত একটি অনুভূতি আমাকে কামড়িয়ে কামড়িয়ে খেতে থাকে। আমার শেষ রক্তবিন্দুর দাগটিও যেন মাটি থেকে মুছে যেতে থাকে। বইয়ের পাতায় যখন আমি নিজেকে খুঁজে পাইনা তখন সমগ্র পৃথিবী আমাকে ধরে বেঁধে নির্বাসনে পাঠায়-হৃদয়ের সমস্ত অনুভূতি আস্তে আস্তে উবে যেতে থাকে গরম কড়াইয়ের উপরে রাখা কর্পূরের মত। নিঃসঙ্গতাকে চাড়িয়ে চাড়িয়ে উপভোগ করার ক্ষমতাও তখন আর মনের থাকেনা। অনিদ্রা সাড়াশির মত চেপে ধরে, দাঁত ব্রাশ করতে অনিচ্ছা হয়, গোসল করতে মন চায় না, ক্ষুধা কমে যায়, নিকোটিনের চাহিদা যদিও অনেক বেড়ে যায় কিন্তু সিগারেটের রাশি রাশি ধোয়া মনটাকে একটুও ভরাতে পারেনা। কোথাও যেতে মন সরে না আবার ঘরের কোনে বসে থাকতেও ভালো লাগেনা। সময়হীন একটা সময় বয়ে চলে যায় শুধু স্রোতস্বিনী নদীর মত অবিরল ধারায়। \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nএমন এক সময়ে একবন্ধুর ঢেকি গেলা অনুরোধ উপেক্ষা করতে না পেরে নিতান্ত অনিচ্ছায় বিকেল বেলায় অসহ্য ট্রাফিক জ্যাম সহ্য করে বিশ্ববিদ্যালয় এলাকায় গিয়েছি ঘুরতে। এখন বিশ্ববিদ্যালয়কে মনে হয় এমন এক জগত যেখানে একসময় আমি বেঁচে ছিলাম আর এখন মরে গিয়ে প্রেতাত্মা হয়ে ঘুরতে এসেছি- আমি সবাইকে দেখতে পাচ্ছি কিন্তু কেউ যেন আমাকে দেখতে পাচ্ছেনা। কোন বন্ধু বা বড় ভাই যারা আমার মতই পড়াশুনার পাট চুকিয়ে এখান থেকে চলে গেছে তাদের সাথে হঠাৎ করে দেখা হয়ে গেলে তাদেরকেও আমার মতই প্রেতাত্মা বলে মনে হয়। তারা নিজেদেরকে এরকম কিছু মনে করে কিনা জানিনা- সম্ভবত করেনা। আমার বন্ধুটির সাথে ঘুরতে ঘুরতে আমাদের ডিপার্টমেন্টের এক আপুর সাথে দেখা হল, দেখলাম সেও প্রেতাত্মার মতো ঘুরে বেড়াচ্ছে। আমাকে কাছে ডেকে নিয়ে বলল, কি করছো আজকাল। আমি ম্লান হেসে বলি, বসে বসে শুধু উচ্চস্বরে কবিতা পড়ি কিছুদিন যাবত তাও পেরে উঠছিনা, পড়তে ভাল লাগছেনা আজকাল। উনি বেশ কষ্ট করে হেসে বললেনঃ তাহলে লিখতে শুরু করে দাও-এমন অবসর হয়তো আর পাবেনা, তাই সময় যেহেতু তোমার অফুরন্ত দুই হাতে লিখতে থাকো। উত্তরে গলা দিয়ে বেরোয়ঃ কি লিখবো আপু, কোনদিন দিন তো লেখিনি কিছু-অভ্যাস নেই। আরে তাতে কি শুরু করে দাও, যা মন চায় লেখো- কোন বাছ-বিচার করোনা। ভয় লাগে যে আপু, যদি কোথাও ছাপা হয় তাহলে তো অনেকেই পড়বে! কে কি মনে করবে- আর কিভাবে লিখতে হয়, লেখার কলা-কৌশল কিছুই তো জানিনা, লোকজন হয়তো হাসাহাসি করবে। থাক আপু, বাদ দেন, আমি লিখতে পারবোনা; লেখা-লেখি আমার জন্য নয়-আমার দ্বারা হবেনা। লেখালেখির বিষয়ে মনে কোন আত্মবিশ্বাস পাইনা- টেনেটুনে একটু সাহসও জোগাড় করতে পারিনা। আপু ধীর স্থির ভাবে বলতে শুরু করলেন, লেখা শেখার কোন প্রাতিষ্ঠানিক কোন স্কুল পৃথিবীতে আছে কিনা আমার জানা নেই। বা থাকলেও সেখানে ভর্তি হয়ে লেখা শেখা যাবে বলে মনে হয় না। পৃথিবীর কোন বড় লেখক যে এরকম কোন স্কুলে পড়েনি সেটা নিশ্চিত করে বলা যায়। প্রত্যেকটা লেখকেরই প্রথমতো যেটা ছিল তা হল পাঠাভ্যাস। তারা প্রত্যেকেই পড়তে ভালোবাসতেন- অনেক সময় কাটতো বিভিন্ন ধরনের বই পড়ে। লেখাটাকে আমার মনে হয় সরের মত আর পড়াটা হচ্ছে দুধ। অনেক পরিমান দুধ জ্বাল করলে যেমন সামান্য একটু সর পড়ে তেমনি অনেক পড়লে, জানলে সামান্য কিছু লেখা হয়তো বের হয়ে আসে, কিছু কিছু বিষয় স্বতস্ফুর্ত ভাবে বের হয়ে আসে আবার অনেক কিছুই মন থেকে টেনে তুলতে হয় যেমন করে গ্রামের মেয়েরা কুয়ো থেকে পিতলের কলসী ভর্তি পানি রশি দিয়ে টেনেটেনে উঠায়। লিখতে হলে অবশ্য জীবনটাকেও ভালোবাসতে হবে, সাহিত্য তো জীবনেরই বিজ্ঞান। প্রত্যেক লেখকই অবশ্য জীবনটাকেও অনেক বেশী ভালোবাসেন, অনুসন্ধিৎসু তাদের দৃষ্টি আর বিজ্ঞানমনস্ক জিজ্ঞাসু ঔৎসুক তাদের মন- এগুলো অবশ্য তাদের পাঠাভ্যাস থেকে তৈরী হয়েছে বলেই আমার মনে হয়। জীবনটাকে খুড়ে খুড়ে বিভিন্ন ধরনের সূত্র বের করে আনেন তারা। সেগুলোকে এবং বিভিন্ন সাধারন কথাকে ছন্দে গাথতে জানেন-পারেন সুর- তাল- লয়ে সেগুলোকে প্রকাশ করতে। যে কোন জিনিসকে সুন্দর করে ফেলবার অসাধারণ ক্ষমতা থাকে তাদের-নইলে কেউ বড় লেখক হতে পারেনা। কুৎসিতের মধ্যে বাস করে সারা জীবন ধরে সুন্দরের তপস্যা করে যেতে হয় তাদেরকে। অগ্নিকুণ্ডে বসেও গান গাইতে জানেন এমন আশ্চর্য ক্ষমতা তাদের। তোমার যেহেতু পড়ার অভ্যাস আছে পড়তে তুমি ভালোওবাসো সুতরাং লেখা-লেখি তোমার করা উচিত এবং তুমি পারবে। কথাগুলো শুনতে শুনতে তন্ময় হয়ে গিয়েছিলাম, আপু হঠাৎ থেমে পড়লে মাথা তুলে বলিঃ সবকিছুই তো বুঝলাম আপু কিন্তু লিখতে যে ভয় লাগে, এই ভয়টাই তো কাটাতে পারছিনা কোনমতেই, সবসময় আষ্টেপৃষ্ঠে লাগে থাকে। আপু সামান্য একটু চিন্তা করে নিয়ে আবার শুরু করলেনঃ তোমার চিন্তা, কল্পনা, নানা রকম অনুভূতি, দুঃখ, বেদনা, সুখ কিংবা তোমার নিজের জীবনে ঘটে যাওয়া বা চোখে দেখা বা কানে শোনা কোন গল্প কল্পনার রঙ মিশিয়ে কোন একান্ত আপন বন্ধুর কাছে যেন বলছো- এমনভাবে লিখে যাবে, শুধু এতটুকু খেয়াল করলে চলবে যে, লেখাগুলো যেন আরো অনেকে পড়তে বা বুঝতে পারে। লেখার উপকরণ ব্যষ্টিক, সামষ্টিক যাই হোক না কেন তা যেন নৈর্ব্যক্তিকতায় ছাপিয়ে যেতে পারে-এটাই সবচেয়ে জরুরী। আর আমরা তো প্রতিনিয়তই অনেক কথা-স্বপ্নের কথা, জীবনের কথা কল্পনার রঙ মিশিয়ে আমাদের কাছের মানুষদের নিকট বলে বেড়াই। সেগুলোকে আরেকটু গুছিয়ে সাদা কাগজে লিখে ফেলা এ আর এমন কি কঠিন কাজ- আর এতে ভয় পাওয়ারই বা কি আছে- শুধু শুরু করে দিলেই হয়-তারপর লেখার আপন গতিতেই চলতে থাকবে। আপনার প্রেরণায় সাহস হয়তো কিছুটা পাওয়া গেলো কিন্তু লেখার বিষয়বস্তু কি হবে? আপুর মুখে একটি তরল হাসি খেলে গেলোঃ যে কোন কিছুই হতে পারে, তোমার যা বলতে ভালো লাগবে তাই লিখে ফেলবে। জীবনের যে বিষয়গুলো তত্ত্বের চালুনিতে আটকায়না নিচে পড়ে যায় নিতান্ত সাদা কথা হয়ে সেগুলিকে সাধারনত সাহিত্যের কাচামাল হতে দেখে গেছে। তাও তো বোঝলাম কিন্তু কি লিখবো, গল্প, উপন্যাস, নাটক, প্রবন্ধ নাকি কবিতা? মৃদু হেসে বললেন, একজন লেখকের কিছু অনুভূতি থাকে কবিতায় বলার মত কিছু কথা থাকে গল্পের বলার কিছু আবার নাটকে ভালো করে বলা যায় কিছু কথা প্রবন্ধে বললে ভালো হয়, জীবনের অনেক কথা বলতে অনেককেই আবার উপন্যাসকে বেছে নিতে দেখা যায়। এর মধ্যে আবার অনেকে আছেন যারা সাহিত্যের একটি শাখাকে বেছে নিয়েছেন তারা ওই একটি শাখাকে অবলম্বন করে নানা কথা বিভিন্ন রকমে বলার চেষ্টা করেন। কেউ কেউ দুটি শাখা বেছে নেয় কেউ কেউ আবার তিনটি। এমনও অনেকে আছেন সাহিত্যের সব শাখাতেই যাদের বিস্তার কমবেশী থাকে। সাহিত্যের যে শাখাটিতে তুমি সবচেয়ে বেশী স্বাচ্ছন্দ্য বোধ কর প্রথমে সেটাকেই অবলম্বন করে লিখতে থাকো, তারপর ধীরে ধীরে নিজেই সবকিছু বুঝতে পারবে। চোখ তুলে তাকালাম, উনি সম্ভবত চোখের ভাষা বুঝতে পারলেন। একটু থেমে বললেনঃ শোন আমি একটি দৈনিক পত্রিকার সাহিত্য সম্পাদক, কিছু একটা লিখে নিয়ে আমার অফিসে চলে এসো, কথা দিচ্ছি ছেপে দেবো। ব্যাগ থেকে কাগজ কলম বের করে অফিসের ঠিকানাটা লিখে দিয়ে, পিঠে আলতো করে দুটি চাপড় মেরে চলে গেলেন। \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nমনের মধ্যে আশার ভ্রমর গুঞ্জন করতে শুরু করে, আমি লিখবো- তা আবার একটি জাতীয় দৈনিক পত্রিকায় ছাপা হবে। লেখার নিচে নিশ্চয় আমার নামটাও ছাপা হবে। ছড়িয়ে ছিটিয়ে পড়বে দেশের আনাচে-কানাচে কত মানুষ আমার লেখা পড়বে, কয়েকজন হয়তো আমার লেখা নিয়ে আমাকে সহ আলোচনা জুড়ে দেবে। লাফাতে লাফাতে বাসায় চলে এলাম। বসে পড়লাম কাগজ-কলম নিয়ে- ঘোরের মত এক সপ্তাহের মধ্যে লিখে ফেললাম তিন-চারটি লেখা। এগুলো দেখতে অনেকটা যেন প্রবন্ধের মত হল-ঠিক হয়তো প্রবন্ধ নয়। এর মধ্যে একটি লেখা ছিল ফিল্ম নিয়ে আলোচনা। আলোচনাটি লেখার জন্য ফিল্মটি আমাকে তিনবার দেখতে হয়েছিল-ফিল্মটি ছিল দীপামেহতা পরিচালিত “ফায়ার”। এই লেখাটি আপু তার পত্রিকায় ছাপিয়ে তার কথা রেখেছিলেন-লেখাটির মান হয়তো একটি জাতীয় দৈনিকে ছাপা হওয়ার মত ছিল না। রাত্রেই আপু আমাকে মেসেজ দিয়ে জানিয়ে দেয় আগামীকালের পত্রিকায় তোমার লেখাটি প্রকাশিত হবে। আমি এমনিতেই বেশ রাত করে ঘুমোই কিন্তু ঐ রাত্রে আমি একফোটা ঘুমাতে পারিনি। সকাল ছয়টায় বাসার গেট খোলার সাথে সাথে সংবাদ-পত্রের দোকানে গিয়ে কাঙ্ক্ষিত পত্রিকাটি কিনে এনে পরম আদরে লেখাটির উপর কয়েকবার চোখ বুলিয়ে তারপর ঘুমোতে যাই। তারপর আপু একদিন ফোন করে জানালো, তোমার বাকী লেখাওগুলো সাহিত্য সম্পর্কিত নয় বলে সাহিত্য পাতায় দেয়া সম্ভব হচ্ছেনা। আর অন্যান্য পাতার সম্পাদকদের সাথে আমার সম্পর্ক তেমন একটা ভালো নয় বলে অন্য পাতায়ও দেয়া গেলোনা। তুমি একদিন অফিসে এসে তোমার বাকী লেখাওগুলো নিয়ে যাও। \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\nবাদ-বাকী লেখাগুলো নিয়ে কি করা যায় ভাবতে ভাবতে মাথায় এলো এগুলো আমি নির্দ্বিধায় বিভিন্ন ব্লগে ছেপে দিতে পারি। সেই থেকে ব্লগিং এ আমার যাত্রা শুরু। ঐ লেখাগুলো ব্লগে দেওয়ার পর আরো কিছু লেখা লিখে ব্লগে দিলাম-এই লেখাগুলো ছিল অনেকটাই গল্পের মত করে লেখা। যা হোক লেখায় বেশ কিছু কমেন্টস পেলাম, কয়েকজন বেশ প্রশংসা করল, কেউ কেউ লেখার কিছু প্রাথমিক ভুল-ত্রুটি ধরিয়ে দিল। আর আমি ব্লগিং এর পথ ধরে ধীরে ধীরে এগোতে থাকলাম। বেশকিছু দিন ধরে ব্লগে বেশ উত্তেজিত সময় কাটাচ্ছিলাম যার ফলে বইয়ের কাছে তেমন একটা আসা হয় নি। উত্তেজনা কিছুটা কমে গেলে বইয়ের কাছে যেতেই বেশ জোরেশোরে একটা ধাক্কা খেলাম। আশ্চর্য আমি আর আগের মত সহজভাবে পড়তে পারছিনা- কোথায় যেন একটু বাঁধছে। আমার ভেতরের পাঠক সত্ত্বা যেন নতুন গজিয়ে উঠা লেখক সত্ত্বাকে মেনে নিতে পারছেনা। বা আমার লেখক সত্ত্বা আমার পুরাতন পাঠক সত্ত্বার ঘাড় মটকে দিতে চাইছে। পড়তে গিয়ে আমি লেখাটির রসের কাছ থেকে বার বার কলা-কৌশলের দিকে ফিরে ফিরে আসছি- লেখক কোথায় কোন অনুপ্রাস ব্যবহার করেছে, অলঙ্কার ব্যবহারে কতটা দক্ষ সে এই লেখায়, কোন শব্দের পর কোন শব্দটা বেশ মানিয়ে গিয়েছে, মেপে মেপে দেখছি সুর- তাল- লয়- ছন্দ ঠিক আছে কিনা, ভাষার কোন শক্তি বলে অনুভূতিগুলো নানা রঙে রঞ্জিত হয়েছে, চিত্রকল্পগুলো লেখায় কতটা সার্থকতা পেয়েছে, উপমাগুলো স্বতস্ফূর্ত নাকি লেখকের কষ্টার্জিত, প্রকৃতির বর্ণনা লেখায় কেমন করে এসেছে, কেমন করে লেখক এখানে চরিত্রগুলোকে তৈরী করেছেন, বিভিন্ন চরিত্রের সাথে পারস্পরিক সম্পর্কের সুতা গুলো কেমন, ঘটনা পরম্পরার মধ্যে সামঞ্জস্য আছে কিনা, লেখার ভাবটি কি অখন্ড নাকি পরস্পর বিরোধী, লেখার মাধ্যমে পাঠক কিছু পাচ্ছে কিনা। আর আমার পাঠক সত্ত্বা এই বিষয়গুলো পুরোপুরি এড়িয়ে চলে, শুধু দেখে লেখাটা পড়তে কেমন লাগছে, ভালো লাগলে গোগ্রাসে গিলে আর ভালো না লাগলে ছুড়ে ফেলে দেয়। বাহিরের সৌন্দর্যটাকে লেখক আমি অনুভব করতে পাচ্ছিনা বদলে দেখছি ভেতরের কলকব্জা। সুন্দর মুখাবয়ব দেখার বদলে দেখতে পাচ্ছি মাথার বীভৎস খুলি। ভেতরে ভেতরে বুঝতে পারলাম- আমার পাঠক সত্ত্বা, নবীন, জোয়ান লেখক সত্ত্বার বিরুদ্ধে যুদ্ধে অনেকটা হেরে গিয়ে পচা ডোবায় পড়ে যাচ্ছে। আবার মাঝে মাঝে ফিরে আসছে তখন রসেরা আমার চোখে ঝিলিক দিচ্ছে, অপূর্ব সুন্দর হাসিটি আবার দেখতে পাচ্ছি আমি-দূর্ঘটনায় অন্ধ হয়ে যাওয়া মানুষ তার চোখে সফল অপারেশনের পর, প্রথম চোখ খুলে আবার দেখতে পেলে যেমন তার যেমন লাগে আমার অনুভূতিটাও ঠিক সে রকম। আবার কখনও খেয়াল করি লেখাটি তার দাড়ি, কমা, ড্যাস, কোলন, সেমিকোলনের নাড়িভুঁড়ি নিয়ে আমার সামনে এসে উপস্থিত। তারপর থেকে আমার লেখক সত্ত্বা ও পাঠক সত্ত্বার মাঝে ঠোকাঠুকি লেগেই আছে। কালের আবর্তনে এরা যখন বুঝতে পারছে আরো অনেকটা সময় হয়তো এদের পাশাপাশি চলতে হবে, তখন এরা নিজেদের মাঝে ঝগড়া-বিবাদ মিটিয়ে ফেলার চেষ্টা করছে, সতীনের ভূমিকা বাদ দিয়ে এখন দুজন পরস্পরের সখি হওয়ার পথে। মাঝে মাঝে এরা গলা-গলি ধরে হাটে বই এর পাতার পর পাতা জুড়ে। তখন ভেতরের কল-কব্জা বাহিরের সৌন্দর্য হয়ে কেমন ভাবে ফুটে উঠেছে তা দেখতে পাওয়া যায়। তখন রস আরো ঘনীভূত হয়ে ধরা দেয় হৃদয়ে, সৌন্দর্য আরো বেশী করে দোলা দিয়ে যায় মনে-প্রাণে। এই দুই সখি পাশাপাশি কিছুদিন চলতে থাকলে হয়তো ধীরে ধীরে পরস্পরের মধ্যে প্রবিষ্ট হবে- কোনটাকে আর আলাদাভাবে চিহ্নিত করা যাবেনা। তখন পাঠকই লেখক আর লেখকই পাঠক। \\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\\n
  • উপরে
  • ১ বছর, ৯ মাস, ৭ দিন, ১৩ ঘন্টা, ৫৮ মিনিট
  • ৩০ টি
  • ৪১ টি

আমার যত লিংকStar

আমার যত ফেভারিটStar

পছন্দের যত পোস্টStar

পূর্বতন পোস্ট Star

সাম্প্রতিক মন্তব্যComment